सर ताज पगड़ी
सजाया था सर ताज कभी, थी कभी न सर से उतरी थी कभी न उतरी पगड़ी, आई कितनी आपदा पर, न शीश झुका सर ताज कभी, जब तक था सर ताज बना पाई ये इज्जत सारी सोच से परे था उतरे न सर ताज कभी कर जब कन्यादान गए मांगी वो चाहत न पुरी, हुए नीलम इस ख्वाइश पर, शीश स्पर्श कर सर ताज कहे, फिर न सोभित होगी ताज आज भी उठता दिल में बडा सा तूफान है देखते क्या हो? कब किसका उतरा, उतरेगा पता नही
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