द्वन्द
एक तरफ है मन एक तरफ जिम्मेदारी एक तरफ अंतर्द्वंद्व एक तरफ परेशानी। दोनों घातक है फैसला जरूरी है कोई आहत न हो ये भी देखना जरूरी है। परिस्थितियां कब सोचती है मन के भाव को भला और जिम्मेदारी का दायित्व अपयश देती ही है सदा। यहीं पर गीता याद आती है मधुसूदन के गीत गाती है कर्मयोग का भाव जगाती कठोरतम मार्ग बताती है। कुरुक्षेत्र के मध्य पार्थ भावुक थे परिस्थितियों के बीच मैं द्वन्द में हूं भावनाओं के ऊपर तो कर्म-धर्म है पार्थ और मेरे नसीब में बस अपयश है।
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