रे अहंकारी सोचो
पदासीन था तो कितनी अकड़ थी, अब कौआ कुत्ता भी नहीं पूछ रहा; पदमुक्तोपरान्त अभिशप्त जीवन में, एकाकीपन से हो,अब कैसे जूझ रहा। कभी न सोचा तुम पद रहते हुए कि ये लाव -लश्कर,शानो शौकत खोना है; मदमस्त रहा रे तू ,पद को पाकर तब जानते हुए कि पद से मुक्त भी होना है। तू अहं में चूर रहा,घिरे रहा चाटुकारों से अकारण इंसानों को,तब थे फटकार रहे; अब न चमचे कभी हाल जानने आता क्या विडम्बना,अब बैठे मक्खी मार रहे। नरेंद्र सिंह 14.12.2023
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