बूंदों की बांसुरी
जब बादल ने छेड़ा सुर, गगन बना मुरलीधर, धरती की पलकों पर उतरी, जल बूँदों की नवरंग रागिनी। सन्नाटे में घुली बांसुरी, न कोई वादक, न कोई ताल, फिर भी हर कण में गूंजता, वर्षा का मधुर कमाल। पत्तों की नोक पे झूमती, नन्हीं बूँदें थिरक रहीं, मिट्टी की साँसों में बजती, गीली सी कोई कहानी कह रही। खिड़की से टपकती धुन, छत पे करता आलाप, ये बूंदें जैसे सुरबहार हों, बरखा रच रही प्रताप। तालाबों की सतह पे, छूकर जो लहरें जागती हैं, वो झंकार सी बजती हैं, जैसे वीणा सी चहकती हैं। नदियों की कल-कल में घुलकर, तानसेन भी खो जाए, ऐसी है ये बांसुरी, जो दिल की भी गाँठें खोल जाए। हर बूँद एक स्वर है उसका, हर झरना उसका गीत, हर कोना जब गूंजे इससे, तब मन हो जाए मीत। सावन का ये संगीत है, ना राग है, ना शब्दों की भूल, केवल है एहसासों की भाषा, और बूंदों की मधुर धूल। तो जब भी बरसे सावन, सुनना दिल की बात, वो बांसुरी फिर बजेगी, जहाँ नज़रों से होगी बरसात।
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