घर भी रोते होंगे....
सूने पड़े घर आँगन दुआर वक़्त को कोसते होंगे, ये घर भी उदास होते होंगे शायद घर भी रोते होंगे, शहरी फ्लैटों में छोटे कमरों के महंगे बिस्तरों पर, कमाने निकले हम लगा के ताले अपने घरों पर, एक सुकून भरी नींद के लिए हम तरसते रहते हैं, गांव जाता हूँ कभी तो लोग अब परदेसी कहते हैं। ये घर भी अकेले में हमें अब मेहमान बुलाते होंगे, ये घर भी उदास होते होंगे शायद घर भी रोते होंगे.. जिन पेड़ों ने ढोए हैं शरारती भरे बचपन हमारे, उनकी टहनियों पर अब क़ोई लटकता नहीं है, हर साल पेड़ों पर लद रहे मीठे आम कई सारे, उन्हें तोड़ने के लिए अब वहां क़ोई रहता नहीं है, उन पेड़ों की उदासियाँ तो बस वही समझते होंगे, ये घर भी उदास होते होंगे शायद घर भी रोते होंगे, लेकर हिस्सा अपना घरों पर ताले लगाए हैं, देकर अधिया खेत को रखा दूसरों के हवाले है, गाँवों से अब लेन देन तक ही अपनी भागीदारी है, शहर में कैद हो चुकी ये जिंदगी हमारी है। बेरुखी से अब घर भी दूर होने की सोचते होंगे, सूने पड़े घर आँगन दुआर वक़्त को कोसते होंगे, ये घर भी उदास होते होंगे शायद घर भी रोते होंगे, - अंजान ये घर भी उदास होते होंगे शायद घर भी रोते होंगे,
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