कर्म ही पूजा
(कर्म ही पूजा ) भविष्य का जो करे निर्माण सफलताओं का बने आधार आत्मज्ञान व आत्ममंथन है जिनसे वे कर्म ही है पूजा समान । जैसी करनी ,वैसी भरनी लोक हितों में श्रेष्ठ बनेगी जिसकी जैसे नियति लेखनी। सत् कर्म के ३ प्रकार जिनको बतलाती हूं इस प्रकार शरीर निर्धारण करे जो आत्मा धारण। स्थिति निर्धारण करे जो स्थिति को प्राप्त । और वेदनीय कर्म है सबसे अलौकिक बना जो आत्मा के अखंड सुख में विघ्न के निमित्त । सभी कर्मों का एक ही लक्ष्य निष्काम और सही उद्देश्य। परोपकार, सत्य व दूसरों की सेवा यही है गीता अनुसार सच्चा मेवा । कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण जो कहलाते इनके दर्पण । कार्यों की गुणवत्ता पहचानो इश्वर से जुड़कर मोक्ष फिर पा लो । न हो अपने कर्मों से विमुख तभी मिलेगा जीवन में सुख । श्री कृष्ण ने दिया ये उपदेश कर्म ही महान व सर्वश्रेष्ठ। जैसे शिक्षक, चिकित्सक, किसान व कलाकार सभी निभाते कर्तव्यों के निर्वहन से अपने सिद्ध अवतार । सभी का कर्म पूजा कहलाता और जीवन का ध्येय सिखलाता। स्वाति की कलम से ✍️
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