ए! चांद एक बात तो बता।
हे! चमकीले चांद ज़रा एक बात बता, अपनी चांदनी पे तू इतना मत इतरा। ये ईद भी तेरी, करवा चौथ भी तेरा, ज़रा अपना धर्म तो बता। धरा पे तेरे लिए क्यों लड़ते ये मूर्ख मनुष्य, ज़रा ये राज़ तो बता। तू तो हर दिल में समान उजियारा भर देता, फिर क्यों कोई तुझको अपना कह देता। तू तो बस नभ का मुसाफ़िर। न तेरे पास कोई मंदिर , ना है कोई मस्जिद, फिर क्यों तुझे अपना बनाने की करते है जिद्द। फिर भी नीचे तेरे नाम पे दीवारें है खड़ी , इंसानियत रो रही, धर्म के नाम पर नफ़रत है बड़ी । कह दे ए चाँद, अपनी शीतल मुस्कान से, कि एक है सबका रब, एक है पहचान से। ना ईद तेरी अलग, ना करवा चौथ पराया, जो दिल में प्यार रखे, तूने उसको ही अपनाया। 🌙
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
