"कहाँ गया वो बचपन?"
"कहाँ गया वो बचपन?" कहाँ गया वो बचपन मेरा, जो मिट्टी में लोटता था बिन डरे ज़रा? जहाँ सुबह की शुरुआत होती थी आम के पेड़ पर चढ़ने से, और शाम खत्म होती थी माँ की डाँट खाने से। ना कल की फिक्र, ना आज का बोझ, बस खिलौनों की दुनिया और सपनों का जोश। स्कूल का बहाना, खेल का बहाना, हर चीज़ में बस अपना ठिकाना। टॉफियों की लड़ाई, वो पेड़ की छाँव, कभी छुपन-छुपाई, कभी चोर-सिपाही का गाँव। दादी के किस्से, वो कागज की नाव, सच कहूं — वही था असली सुखदाव। अब सब कुछ है — मोबाइल, कार, कमाई, पर वो बेफिक्री, वो मस्ती… कहाँ समाई? कभी वक़्त मिले तो ढूंढना ज़रा, शायद किसी पुराने खिलौने में आज भी बैठा हो — तुम्हारा बचपन… चुपचाप।
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