हे मुम्बई विमानपत्तन की जगमगाती रात्रि पारी
हे मुम्बई विमानपत्तन की जगमगाती रात्रि पारी, तुमसे लड़ना हर दिन वाकई लगता है भारी खारघर से हर दिन चलती है रात्रि की पहरेदारी, बस में सही जगह बैठने की रहती है मारामारी, पहुंचकर आराम से बाहें तोड़कर रखते हैं कदम, पहचानपत्र उठाकर अपना बिखर जाते हैं हम, कर्तव्य स्थान पर कर हस्ताक्षर होते हैं इधर उधर, रात्रि की पहरेदारी का शुरू होता है अनोखा सफर, झट से निकाल टिफिन अपना फिर मुंह चलाते हैं, मोबाइल निकालकर किस्मत पर दांव लगाते हैं । गैलरी में बैठ हथेलियों पर खैनी चूना रगड़ देते हैं , सीटियां लगने पर भी हम लोग अनसुना कर देते हैं, फिर देख माहौल सभी धीरे धीरे कतार में आते हैं, मशीन दर मशीन नफरी का मिलान करवाते हैं, दैनिक घटनाओं का वर्णन खास अंदाज में होता है, कभी कभी नैतिक शिक्षा में भी विशेष रुझान होता है, जल्दी कर्तव्य स्थल पर पहुंचने की गुहार लगती है, उससे पहले सिक और लीव की भी क्लास चलती है। काफिला अपनी मस्ती में नित्य क्रियाएं करता है, चेहरे पर मुस्कान लेकर लिफ्ट में प्रवेश होता है, खुलते बंद होते लिफ्ट में आवाजाही चलती रहती है, दोस्त दोस्त की गूंजती आवाजें भी हरकत करती हैं, इंतजार में चेहरे पर क्रोधाग्नि भड़कती रहती है, हमें देखकर कुछ उनके कलेजे को ठंडक पड़ती है, पहुंचते ही फिर ब्रेक रजिस्टर भरने लगते हैं, पहले और बाद में जाने के लफड़े चलते हैं, यात्रियों की भी अजब गजब कहानी चलती है, उनकी देख हरकतों को अपनी खिसकती रहती है, मध्य रात्रि बीतने के बाद असल लड़ाई चलती है, मशीन पर बैठते ही आँखें नींद की कैद में रहती हैं, मादक द्रव्यों को लेकर भी नींद का असर नहीं जाता, कभी प्रत्यक्ष दिख रहा SRI भी हमें नजर नहीं आता। रेस्ट रूम तो है मगर उस पर प्रतिष्ठित वर्ग ही काबिज है, हमें तो वो दूर से ही देखकर कहते खुदा हाफिज हैं। ऐसे ही संघर्ष करते करते किसी तरह आठ बजते हैं, मौका देख कर लोग पहले ही बसों में सीट रख लेते हैं, आठ पार होते हैं दिल दिमाग का सायरन बजने लगता है, रिलीवर जल्दी आ जाए उसकी झूठी आस करने लगता है, डायब्रिफिंग की भी अलग ही कहानी चलती है, देरी हो तो मन में फिर अलग ही आग बरसती है। खैर इस तरह से समाप्त होती है रात्रि की अपनी पहरेदारी, धूप में घर का दरवाजा खटखटाकर करते हैं पूरी जिम्मेदारी। हे मुम्बई विमानपत्तन की जगमगाती रात्रि पारी, तुमसे लड़ना हर दिन वाकई लगता है भारी।
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