त्रिभंगी छंद
शीर्षक- मंथन हो। हम कैसे आए, क्या-क्या पाए, इस पर भी तो, मंथन हो। हम कैसे छाएँ, किसे लुभाएँ, न सिर्फ इसका, मंचन हो।। ईश्वर है भेजा, वही सहेजा,उनका हमसब, गुण गाएँ। उस परम शक्ति में ,लीन भक्ति में, रहकर उनको, अपनाएँ।। प्रभु संकट घालक, सबका पालक, , सभी कष्ट के, भंजक हैं। सबकुछ के दाता, वही विधाता, नर जीवन के, रंजक हैं।। जबतक है जिन्दा, प्राण परिंदा,उनके गुण का, गान करो। हमसब के रक्षक, दुख के भक्षक, उस स्वामी का, ध्यान धरो।। नरेंद्र सिंह, 19.04.2025
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