किताब...
मुझे वहीं से पढ़ना, जहाँ मैंने ख़ामोशी ओढ़ ली थी। हँसना, लड़ना, झगड़ना ये फ़न अब सीखा है, जैसे जीना आया हो। मैं तो हमेशा एक खुली किताब था, मगर उसके सफ़्हे ख़ाली थे। जिन्हें वक़्त, हालात और लोग अपने मिज़ाज से लिखते चले गए। क़लम मेरे हाथ कुछ देर से पहुँची, मगर अब जो थामी है एक ऐसी दास्तान तहरीर करूँगा, जो वक़्त नहीं, तारीख़ बयान करेगी। V...
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