वह याद क्यों है
चाहे कितना भी समेटू, बिखर जाता क्यों है एक शख़्स मुझे इतना सताता क्यों है..! मैं हार जाता हूँ खुदसे ही, उससे लड़ते लड़ते उसे मुझसे जीतने में, इतना मज़ा आता क्यों है..! क़ैद रखता हूँ मैं, एहसास कई सारे ज़हन में वो चाभी हर बार मगर, खो जाता क्यों है..! रेत मुट्ठी में फिर भी, टिक जाए कभी रिश्तों का धागा मगर, हर बार टूट जाता क्यों है..।। मनोज सोरेन ✍️✍️ दुमका (झारखंड) Email - manojsoren5290@gmail.com
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