कारवाँ-ए-जिंदगी
हम चलते रहे, राहें बढ़ती रही दिन गुज़रते रहे,रात ढलती रही न मिली मंजिलें न सफर आखिरी रूह मरती गयी ,सांस चलती रही जब ख़तम हो गया सांस का सिलसिला तब भी चलती रही,जिंदगी कारवाँ
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