" लाल ईश्क "
=======/=/========== आज तुम्हारी आँखों ने , मुझे बुलाया यह कहकर । आओ प्यारे हे प्रियतम , देखो तुम मुझसा बहकर ।। रिश्क बहुत है रिश्ते में , दिल मेरा यह कहता है । अंतर्मन शुचि भावों से , उद्गारित हो बहता है ।। देख तुम्हें कटता केवल , याद स्मरित जीवन हँस कर । आज तुम्हारी आँखों ने , मुझे बुलाया यह कहकर ।। द्रवित हृदय तल भावों से , तुम्हें पुकारा करता हूँ । पाकर सपनों में तुझको , निशिदिन आहें भरता हूँ ।। दंभ कभी तुम मत करना , रूपवती हूँ यह कहकर । ढल जाओगी तुम वरना , प्रियतम के आँसू बनकर ।। क्यों तड़पाती हो हृदया , अंक लगाकर तुम मुझको । दर्द छुपा कर क्यों कहती , चाहूँ नहीं न अब तुझको ।। आज बिलासा की नगरी , लाल ईश्क रखती चुपकर । सुन 'नरेन्द्र' की शुभ धड़कन , गई कहाँ आती कहकर ।। नफरत का मत ढोंग रचा , ख्याति तुम्हें ही चाहा है । दृढ़ संकल्पित होकर क्यों , उस अतीत में थाहा है ।। आज छुपाती फिरती हो , यौवन सावन में बसकर । क्यों बोला करती थी तुम , ले जाऊँगी जी गहकर ।। लाल रंग से परिपूरित , ईश्क रखो मत दिल में तुम । रे मानव पछताओगे , काम नहीं आए कुंकुम ।। करना ही हो ईश्क तुम्हें , राष्ट्र प्रेम रस है बढ़कर । आज तुम्हारी आँखों ने , मुझे बुलाया यह कहकर ।। शिवकुमार बर्मन ✍️
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