वो – २
भूलाकर हंसी अपनी अपनों को ख़ुश वो कर गई वैसे देखने में तो ज़िंदा थी पर अंदर से वो मर गई सोची सबके बारे में और निभाती रही वादे सारे दबाकर चाहत अपनी ख़ुद के मन से वो लड़ गई बस कहने के लिए रह गए थे कुछ अपने उसके बेचारी उन खोखले रिश्तों को खोने से वो डर गई ससुराल में करती पूरी मेहनत से सेवा सबकी ना कहती कभी कुछ, बस अंदर से पूरी वो भर गई पति से भी गई दुत्कारी ना मिलता तनिक प्यार उसे हो जायेगा सब ठीक की झूठी उम्मीदों में वो पड़ गई मां–बाप, भाई–बहन लगे थे उसे उसके अपने पर जब समझ गई सबको तो नहीं वो अपने घर गई था एक आशिक़ उसका उसको बेपनाह चाहने वाला लेकिन ना दुबारा मोहब्बत करने की बात पर वो अड़ गई ना करती किसी से शिकायत ना था कोई शिकवा गिला हाथ जोड़ कहती प्रभु से पाकर ऐसा जीवन मैं तर गई भूलाकर हंसी अपनी अपनों को ख़ुश वो कर गई वैसे देखने में तो ज़िंदा थी पर अंदर से वो मर गई
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