एक शाम की चाय
एक शाम की चाय , जो कुछ उम्मीदों वाली हो , जो रईसों की डिक्शनरी में unhygienic कहलाती हो, जो बीते हुए कल की कुछ यादें सजा दे , जो थके हारे इस मन को एक बार फिर से जगा दे , जो तपती दोपहर में ठंडी तालाब सा हो , जो इस मन के किसी कोने में सजा ख्वाब सा हो , जो फूलों की तालाश में मिले बाग सा हो , जो गायकों की वाणी में छुपा राग सा हो । किसी सड़क किनारे जहां महफिल की शाम हो , कहीं दूर से आ रहे यारो का सैलाब हो , ओर बगल में उमर रही उसकी पुकार हो , जिसे पीने के खातिर मचल रही दिल में उबाल हो , जिसकी पहली घोट में मन यूं समा जाए , की व्यर्थ चिंतन ओर व्यथा कहीं दूर चल जाए , फिर ग़रज़ रहे बादलों की कृपा से जो , इस शाम की शान में चार चांद लग जाए ।। जो धूल जमे कुछ यादों की रुख में ढाल दे , ओर वर्तमान में बैठे इस मन को कहीं अतीत में वार दे , एक शाम की चाय जो कुछ उम्मीदों वाली हो , जो रईसों की डिक्शनरी में unhygienic कहलाती हो ।।
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