जलेबी
सर्द हवाओं भरी सर्द शाम में जलेबी खाने का आया विचार, उभरे हुए पेट ने भी नहीं किया इंकार। बाहर जाकर जलेबी खाने की शुरू की तैयारी, कंपकंपाती ठंड में बाइक की करनी पड़ी सवारी। मिठाइयों के बीच बैठा , बनकर वो सेठ, भारी भरकम रसगुल्ले सा उसका गोल मटोल पेट। बड़े बड़े अक्षरों में लिखा मिंटू हलवाई उसका नाम, तिकोने समोसे जैसे बड़े बड़े उसके कान। लगा जैसे पूरी दुकान का खुद खाता हो वो माल, लड्डू जैसे गोल गोल फूले उसके गाल। चेहरे के दोनों तरफ जुल्फ़े, बीच में रास्ता जैसे पतली राही, नाक ऐसे जैसे प्लेट में रख रखी हो बालूशाही। काली काली आंखों में असर्फी सी चमक, चाशनी में डूबे हाथ जैसे लगा रखा हो नमक। अर्धनग्न शरीर, ऊपर से वो घने बालों वाला सीना, कढ़ाई में गर्म तेल के जैसे माथे से टपकता पसीना। मिठाइयों की वो अनचाही सी खुशबू कैसे रहा था झेल, मिठाइयों से ज्यादा उसके शरीर पर मक्खियां दिखा रही थी अपना खेल। घर से निकला तो मन में था जलेबी खाने का जो भाव, दृश्य देखकर दुकान का जिव्हा में हुआ स्वाद का अभाव। बड़ी अजीब सी दुविधा में मैने मेरे मन को पाया, उस शरद शाम में मैं बिना जलेबी खाए घर को आया।
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