विश्वास
सुनो तुम परेशान न होना ,जब कभी मैं जाऊँ हार संघर्षों में ही यदि खप जाऊँ,हो जाए फिर शाम प्रिय हार- जीत जीना मरना, ये तो लेख विधाता का है हम तो बस कठपुतली,अधिकार केवल कर्म का है। कुछ हारा तो कुछ जीतूंगा भी कुछ फिसला तो कुछ बढुंगा भी कभी भटकुंगा तो कभी पहुँचुंगा जीवन का सफर बस यही प्रिय। कितना पाना क्या क्या खोना कितने आंसूं कितना सुख नींद कितना यश कितना अपयश बस बेकार का ये गणना प्रिय। इस खेल का तुम आनंद उठाओ अपने हिस्से का बस कला दिखाओ जितना क्षमता उतना ही भार उठाओ क्यों अनायास तन-मन पर बोझ प्रिय। देखो तुम मन छोटा न करो अब भी प्रिय तुम चिंता न करो जाने से पहले पूर्ण करूंगा काम अधूरा न छोड़ूंगा इतना करो विश्वास।
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