हमारे भीतर
इस संसार में हम अकेले आते हैं और जैसे जैसे बड़े होते हैं माता पिता के आंगन से निकलकर एक बहुत बड़ा संसार जिसमे भिन्न भिन्न चेहरों के भिन्न भिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों से मुलाकात करते हैं जिसमे कुछ अच्छे कुछ बुरे और उनमें से कुछ लोग बेहद करीबी बन जाते हैं लेकिन उनमें से कुछ इतने अपने हो जाते हैं जैसे हमारा ही साया सा हो और हमारे साए को तो हमारे बारे में सब कुछ मालूम होता है ना! और हमारा साया हमेशा हमारे साथ रहता है । लेकिन बताने की बात ये है कि वो रोशनी में साथ होता है अंधेरे में नहीं।लेकिन हम उसके इस दो गुलेपन से परेशान होकर क्या उसे खुद से अलग कर सकते हैं नहीं न! क्योंकि वो हमारे एक अंग जैसे साथ रहता है उसी तरीके से वो लोग जो साए जैसे करीबी होती हैं उनके अलग होने से भी हम उन्हें भुला ही भी सकते क्योंकि वो हमारे मन के भीतर पूरे जीवनकाल के लिए हमारा एक अंग "साया" बन जाते हैं।
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