त्रिभंगी छंद
हे भाग्य विधाता, सबके दाता, मान रखो अब, त्रिपुरारी। तुम कष्ट विनाशक, राम उपासक, अजर अमर हो, अवतारी।। तुझको जो भजता, वह है तरता, कोई भी हो, नर-नारी। सबके हो स्वामी, अन्तर्यामी,जग के मालिक, उपकारी।। नीलकंठ प्यारे, योगी न्यारे, हो जन-जन के , हितकारी। बाघम्बरधारी, संकटहारी, भस्म लपेटे, जगधारी।। बसते हो काशी,हे अविनाशी, हर हर भोला, संन्यासी। हे करुणा सागर, सब गुण आगर, डमरूधारी , गिरि वासी।। नरेंद्र सिंह 20.04.2025
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