आपकी नज़रों का
आपकी नज़रों का गर कोई इशारा होता चाँद को हमने ज़मीं पर ही उतारा होता दूर परदेस में अपना न दुलारा होता मुफ़लिसी का न अगर घर में इज़ारा होता पार कर लेते मुहब्बत का हर इक दरिया भी पास अपने भी अगर कोई शिकारा होता। प्यार गर तुम भी किसी से मेरे हमदम करते हाल जो आज हमारा है तुम्हारा होता एक दिन डोली में रुख़्सत भी उसे करते तुम तुमने गर कोख में बेटी को न मारा होता बढ़ के शायद मैं उसे रोक भी लेता फिर से हाथ में जो तेरे पल्लू का किनारा होता दाद 'मीना' की ग़ज़ल को भी तो होती हासिल ख़ून से दिल के अगर इसको निख़ारा होता
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