मुसाफिर
मैं तो सफर में हूं यारा आज यहां कल कहीं रहूँगा कुछ यादें कुछ बातें मगर तुम्हारे लिए छोड़ जाऊँगा । मैं महकुंगा या खटकुंगा ये तुम जानो मैं तो अपना काम करके चला जाऊँगा ज़िन्दा रहेंगी मेरी बातें मेरे जाने के बाद भी उन बातों में क्या अच्छा क्या बुरा तुम जानो। मैं तो साधक हूं ,साधना मेरा काम प्रिय मैं तो याचक हूं , याचना मेरा काम प्रिय तुम बोलो तुम क्या दोगे प्रेम या तिरस्कार मैं क्या लेकर जाऊँगा ये अब तुम्हीं जानो। प्रेम, अपनत्व ,सहयोग, समर्पण की धुनी जलाए बैठा हूं आज अपने अहम अपने स्व को स्वाहा कर सबको पिरोने मैं संकल्पित बैठा हूं आज। जो भी हो अब फल साधना का नीत प्रयासों की मुरली बजाता हूं भले जल जाए होम में हाथ मेरा पर फिर भी समिधा नीत जलाता हूं। मेरे जाने के बाद भी रहेगी मेरे धुनी की खुशबू चहूँ ओर मैं न रहूँगा यहां मगर मेरे नदीम मेरे साधना के चर्चे होंगे चहूँ ओर।
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