‘खुद को भी बचा लिया कर’
हर दुआओं में इतना ना मिलकर सबको, कभी-कभी खुद को भी बचा लिया कर, ये लोग, ये जमाना इतना हमदर्दी भी नहीं, बिखरने लगे अगर अपनों की महफिल में कभी, संभल कर, खुद को भी संभाल लिया कर कभी, यूं तो बेहतर लगता है सादगी का लिबास इंसानों पर, किंतु अब हावी सी हो गई है द्वंदता इंसानों के रिश्तों पर, कभी बिखर कर अनजानी राहों पर यूं ही, अपनों की भीड़ में कभी अपनेपन की पहचान भी कर लिया कर, तू जो भटकता रहता है हर रोज दुनिया की भीड़ में, कभी तो गौर कर ले अपनी बेख्याली पर भी, यूं ही अकेले में, स्वार्थीपन का किरदार भी निभा लिया कर, हर शाम इतने लंबे रास्तों पर, कभी खुद के अंदर भी जाया कर, कभी-कभी खुद को भी बचा लिया कर !! कवि–राजू गुजराती
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
