मैं✨
उजालों को ढूँढती, इक दीपक भी हूँ मैं...। हर राह पर खड़ी, अँधेरी चुप भी हूँ मैं...। सपनों की दुनिया में पल-पल जीती हूँ मगर, टूटे यक़ीनों का इक खंडहर भी हूँ मैं...। रिहाइश की चाह में पारिंदो सी उड़ती हूँ...। मगर अपने ही अहसासों की ज़ंजीर में जकडी हूँ मैं...। जिसे लोग कहते हैं दरिया सी बेफ़िक्र, वही गहराई में छिपा इक किनारा भी हूँ मैं...। जो दिखता है, वो सच मान लिया जाता है...। वो चेहरा नहीं, कोई नकाब भी हूँ मैं...। बहुत सीधी, सरल और सहज हूँ ज़ाहिर में, पर सुलझ न सके जो, वो किताब भी हूँ मैं...। हर महफ़िल की चहक में शामिल हूँ मैं...। और दिल की तन्हाई में ग़ुमसुम भी हूँ मैं...। मेरी बातों में होती उलजन है सदा , मगर सवालों मैं छिपा एक जवाब भी हूँ मैं...।
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