हृदय की अभिलाषा
परिभाषा प्रेम की बहुत सरल है मेरे लिए, तुम्हारी मुस्कान ही मेरी मुस्कुराहट है तुम्हारी उलझने मुझे भी व्यथित करती है तुम्हारे हृदय से लगकर बिसरा सकती हूँ, अपनी पीड़ा सारी पर, तुम्हारे माथे की शिकन तुम्हारी व्याकुलता मुझे भी कष्ट देती है चाहती तो हूँ अपनी व्यथा सुनाना और तुम्हारी सुनकर उसे कम करना चाहती हूँ तुम संग आनंद, फिकरी, आतुरता, जिज्ञासा, दिनचर्या सब में अहम हिस्सा बनाना जीवन के ' सुखद पल' का भी तुम ही प्रथम और अंतिम ख्याल होगे समर्पण, संवरना- सँवारना, सहेजना, देखभाल करना यही स्वभाव है मेरा तुम्हे ज्ञात है तुम्हारे प्रेम और समर्पण को ही अपना संसार समझती हूँ मेरा अवगुण शायद यही है कि मैं प्रेम करती नहीं प्रेम जीती हूँ......... और जीवन पर्यंत यही चाहती हूँ|
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