पिता-पुत्र संवाद
जा रहे हो कर्म पथ पर रखना ये याद सदा, मान स्वाभिमान पर ना आंच आनी चाहिए.. सार्थक हो कर्म तेरे जीवन अनुशासित हो, पुत्र तुम पितरों के पुण्य से प्रकाशित हो.. कर्म की ये राह में ठोकरें मिलेंगे बहुत, याद रहे लाल तेरा हौसला ना प्रभावित हो.. उम्र के पड़ाव में ये होता सभी के साथ, मोह और माया अपनी जाल लिए आते हैं.. जीवन भले खींचे तुझे माया के जाल में, कर्म के प्रभाव से हर माया वहां खंडित हो.. झेलते हर मुश्किलों को सुरमा ही समर में, चाह बस प्रतिभा का गान होना चाहिए.. लाडले हो घर के किंतु कर्म में कठोर बन, सफलता का एक नया कृतिमान स्थापित हो...
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