परायापन
गैरो से क्या शिकायत करे तोड़ा तो अपनो ने है। मुस्कुराए इतना कि दुख दिखाई नहीं देता। समझ का पर्दा ऐसा लगाया कि हमारे जज़्बाद ही छुप गए। हजारों के भीड़ में हम अकेले रह गए। टूटकर बिखर गए हौसले उनके आवाज में छिपे निराशा के अहसास से। मिल गए बक्से में बंद हजारों आसू उनकी बातो के पीछे की खामोशी में। वो साहस के शब्द जाने कहा से उभरकर आए अपने अंदर झांककर देखा तो खोखलापन ही मिला। खामोश हो गई है मेरी सारी हसी इस दुनिया की अन्याई लड़ाई लड़ते लड़ते
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