मोहब्बत
मोहब्बत- वो रंग जो दुनिया को क़ौस-ए-क़ज़ह बना दे, हर ढलती शाम को रौशन सुभह बना दे। चराग़ की बात क्या, अँधेरों को आफ़ताब बना दे, बुझते सूरज को भी नर्म सा माहताब बना दे। बे-आवाज़ लफ़्ज़ों को मीठा साज़ बना दे, बिखरे हुए दिल को अपना हमराज़ बना दे। रूठी हुई क़िस्मत को भी मेहरबान बना दे, हर अधूरी चाहत को फिर अरमान बना दे। ये दर्द को भी मीठी-सी एक अदा बना दे, हर दूरी को चाहत की सदा बना दे। वीरान से रस्तों को गुलज़ार बना दे, हर खोई हुई मंज़िल को आसान बना दे।
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