पागलपन
मुझे खूंटी से चाँद बाँधना है, खिड़कियों पर सूरज टाँगना है। दीवारों पर इंद्रधनुषी चादर ओढ़ानी है, सितारों की महफ़िल छत पर सजानी है। हाँ, माना सबको ये अजीब लगे, पर ये ख़्वाब मेरे बेहद क़रीब लगें। क्यों नहीं परिंदे मुझसे गुफ़्तगू करते, क्यों नहीं ओस की बूँदें पहले मुझ पर गिरतीं। क्यों नहीं पत्ते सिर्फ़ मेरे लिए हिलते, क्यों नहीं फूल मुझे देखकर खिलते। हाँ, जानती हूँ ये थोड़ा पागलपन है, मगर क्या करूँ — यही पागलपन मुझे पसंद है।
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