ममता
अपनी माँ को लिख सकूँ, इतनी काबिलियत तो नहीं मुझमें, पर हाँ, तुम दोनों ने मुझे “ममता” सिखाई है। तुमने सिखाया, दर्द में भी अपने जने को देखकर मुस्कुराना, थके हुए दिनों में भी तुम दोनों के लिए सब कर जाना। तुमने बताया, मेरी माँ भी मुझसे यूँ ही बेपनाह मोहब्बत करती होगी, मेरी हर छोटी तकलीफ़ पर ख़ुद बिखरती होगी। तुमने समझाया, कि बच्चों को महफ़ूज़ रखने के लिए माँ हर हद तक जा सकती है, और प्रेम, सिर्फ़ कहा नहीं, निभाया जाता है। जब भी तुम्हें संभालने का ख़याल आता है, माँ की हथेलियों की गर्माहट याद आती है, जैसे तुम्हारी फ़िक्र करते-करते मैं ज़रा-ज़रा उसे समझने लगी हूँ। तुमने मुझे ममता सिखाई है, अपनी माँ को लिख सकूँ, इतनी गहराई अभी नहीं मुझमें, मगर तुम्हें महसूस करके मैंने माँ को ज़रा और पहचाना है।
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