“माँ…”
माँ, तुम मेरी सबसे खास सखी हो, बिना स्वार्थ के जो बस सच्ची खुशी हो। मैं जैसी बनना चाहूँ, वो तुम्हारा ही साया है, हर दर्द में तुमने मुझे अपना बनाया है। तबीयत जब भी मेरी जरा सी बिगड़ जाती है, तुम्हारी दुनिया बस मेरे इर्द-गिर्द सिमट जाती है। नज़र से बचाने को ताबीज तुम पहनाती हो, हर मुश्किल में मेरी ढाल बन जाती हो। कोई कुछ कह दे तो तुम लड़ जाती हो, मेरे लिए हर बार दुनिया से भिड़ जाती हो। मुझे इतना कैसे तुम समझ लेती हो माँ, मेरी खामोशी को भी पढ़ लेती हो माँ। दुनिया साथ हो या न हो मेरे साथ, तुम थाम लेती हो हर गिरती हुई बात। सोचती हूँ जब मैं दूसरे घर जाऊँगी, इतना प्यार वहाँ मैं कहाँ पाऊँगी? खुद कम खाकर भी मेरा पूछती हो, हर दिन बस मेरा ही सोचती हो। माँ तुम ऐसी क्यों हो, इतना प्यार क्यों करती हो, मेरी हर सांस में बस तुम ही क्यों बसती हो…” ❤️ नेहा...
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