इश्क़
मैं ख़्वाब लिखूँ तो ख़याल उसका आता है, मैं सवाल लिखूँ तो जवाब उसका आता है। मैं फ़िक्र लिखूँ तो साथ उसका आता है, मैं तन्हाई लिखूँ तो साया उसका आता है। मैं मेहर लिखूँ तो नूर उसका आता है, मैं सहर लिखूँ तो वो शफ़क़ बन आता है। मैं सुख़न लिखूँ तो जिक्र उसका आता है, मैं इश्क़ लिखूँ तो वो ख़ुद चला आता है। कुछ यूँ घुला है वो मुझमें, मैं बात लिखुं कोई भी वो तहरीर बन जाता है।
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