नींद और मैं।
ये नींद और मेरा भी अलग ही फ़साना है, यूँ तो इसे हर रोज़ दौड़े चले आना है, पर छुट्टी वाले दिन मुझे देख इठलाना है, जितना मैं बुलाऊँ, उतना ही इसे तड़पाना है। दफ्तर के दिन में आँखों में ठहरी रहती है, और अवकाश को तकिए संग मुस्कुराना है, सच कहूँ, इस नींद का भी बड़ा याराना है, मेरे चैन से इसका विरोध पुराना है।
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