अब शांत हूँ!
सब बोल रहे हैं, पर मैं शांत हूँ; देख रहा हूँ उनके घाव, उनकी जुबान से निकलते वो कीड़े; उनकी आँखों में बस झूठ और फरेब के सिवा कुछ ना दिखता मुझे...... उनकी भाषा में अपनेपन सा ना लगता और ना ही उनके हालात को देख कर दया आती है... नहीं, गुस्सा नहीं हूँ उनसे, बस खुद से नाराजगी है थोड़ी! उदास हूँ क्योंकि उनके शब्दों के भार भी अब कागज से लगने लगे हैं शक होने लगा है उनकी बातों की गहराइयों पर... उनकी भाषा पर अब भरोसा ना रहा मुझे क्योंकि हार गया हूँ उन पर भरोसा करके.. जिनकी आँखों में दिखता था प्यार कभी अब बस झूठ, फरेब और खुद गर्ज़ी नज़र आती है उनमें शायद मैं दूर हूँ बहुत उनकी दुनिया से... नहीं है मुझमें साहस यह सब देख पाने का... नहीं रह पाऊंगा इतने नकली भविष्य की रोशनी में... इसलिए... शायद मेरा इस कलम को रख देना ही सही है.... शायद मेरा मेरे दुख में गुम हो जाना ही बेहतर है... शायद मेरा अकेले हो जाना ही सही है!
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