बीते लम्हे
इन कुछ ओर दिनों के साथ ही , एक ओर वर्ष अब खत्म होगा , कुछ अद्भुत पंक्तियां लिखी राह में , तो कुछ अलंकारों का पतन हुआ , कभी नरमाहट छाई जो जीवन पर , तो कभी ज़ख्मों भरा एक गांठ रहा कुछ हसी छाई अपनों के संग में , तो कुछ अकेलापन भी साथ रहा , कुछ यादों का एक सिलसिला बांधे, पुराने पन्ने अब समेत लिए , नए चुनौतियों के स्वागत में , लिखी खिताबे बेच दिए । कुछ सीखकर , कुछ सिखाकर , डगमगाहट भरा यह साल रहा नई उम्मीदें , नई कहानी , और नई पहेलियों का सैलाब रहा ।। कुछ पहेलियों की उलझन में , पूरी आदतें छूट गई , आवारा फिरने वाले की , आज एक कमरे में सांसे गुंज रही ।। कुछ धूल भरी पंक्तियां भी पढ़ी , ओर हस्ते मस्त अब रहते है , 17 सालों की जद्दोजहत बाद , एक प्यासे को पानी भरता भी देखे है। यह साल मुझे जवाब नहीं , पर कई और सवालें दे गया , पर हर सवालों ने मुझे थोड़ा ओर " मैं " है बना दिया ।।
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