राम नाम सत्य है
राम नाम सत्य है, पर सत्य सिर्फ अंत नहीं—एक शुरुआत है, यह कोई कहानी नहीं, यह जीवन का खुला हुआ राज़ है। बचपन में जो सच्चाई थी, वो कहीं रास्तों में खो गई, सपनों, इच्छाओं की दौड़ में ज़िंदगी खुद से ही दूर हो गई। मोह-माया का ये जाल बड़ा गहरा, लेन-देन में उलझा हर चेहरा, रिश्तों का भी हिसाब होने लगा, प्यार भी जैसे किताबों में तौलने लगा। कभी अमीरी का घमंड, कभी गरीबी का डर, कभी खुशी का दिखावा, कभी अंदर ही अंदर बिखर। रिश्ते-नाते, नाम और पहचान, सब यहीं छूटने है जिसे अपना समझा उम्र भर, वो एक दिन दूर जाने वाले हैं। कभी सोचा ही नहीं— मैं कौन हूँ, क्यों आया हूँ? इस भीड़ में भागते-भागते क्या सच में कुछ पाया हूँ? आज जब ठहरकर देखा खुद को, तो सच्चाई सामने आई, जिसे पकड़ने में उम्र बीत गई, वो तो बस एक परछाईं थी भाई। मझधार में खड़ा हूँ आज, न किनारा साफ दिखता है, पर अब समझ आया— सफर ही असली रास्ता है। चिंता की आग में जलते-जलते अब ये मन शांत होना चाहता है, बाहर नहीं, भीतर कहीं अपना घर ढूंढना चाहता है। अंत में बस यही समझ आया— ना कुछ मेरा, ना कुछ तेरा, सब कुछ यहीं रह जाएगा, बस कर्म ही साथ जाएगा मेरा। राम नाम सत्य है— ये अंत की पुकार नहीं, ये जीवन का सार है।
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