जी लेते हैं अपने बचपन को......
चलो मिलते हैं, फिर जी लेते हैं अपने बचपन को, वो बेफिक्र दिन, वो हंसी, वो नादान सपनों को। जहाँ न कोई डर था, न जिम्मेदारियों का बोझ, बस बारिश में भीगना, और मिट्टी में खेलना रोज। चलो फिर से कागज़ की नाव बहाते हैं, उन छोटी-छोटी खुशियों को फिर से अपनाते हैं। ना कल की चिंता, ना आने वाले कल का ख्याल, बस आज में जीना, वही सच्चा था कमाल। चलो फिर से वो गलियाँ याद करते हैं, जहाँ हर मोड़ पर हम खुद को पाया करते थे। चलो मिलते हैं, फिर जी लेते हैं अपने बचपन को… क्योंकि बड़े होकर हम कहीं खो गए हैं, अब वक्त है खुद को फिर से पाने का, और दिल से मुस्कुराने का। 🌸
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