दुश्मन
अजब कशमकश है दिल में, अजब ये सवाल है, क्या मेरा दुश्मन भी, मेरे जैसा ही दयावान है? शायद जिसे मैं नफ़रत की स्याही से लिख रहा हूँ, उसके भीतर भी कहीं, करुणा का एक जहान है। हो सकता है उसकी चोट ने उसे पत्थर बना दिया, या हालातों ने उसकी मासूमियत को दबा दिया। पर इंसानियत का अंश तो हर रूह में होता है, क्या पता उसने अपनी दया को, दुनिया से छुपा दिया? लड़ाई तो बस विचारों और रास्तों की होती है, वरना हर आँख कभी न कभी, किसी के लिए रोती है। अगर मैं दया का दीया जलाकर खड़ा हूँ राहों में, तो मुमकिन है, उसके मन में भी कोई लौ सोती है। वो मेरा अक्स ही तो है, बस नज़रिया जुदा है, मेरे भीतर भी इंसान, उसके भीतर भी खुदा है। दुश्मनी की दीवार के उस पार भी झाँक कर देखो, शायद वह भी अपनी ही किसी जंग में, बेतहाशा थका है।
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