कलम 🖊️ उठी कोई वेदना में ,
कागज अभी भी है संवेदना में , आज कलम उठी है वेदना में , बोली , मैं, खेतिहर का संघर्ष लिखूं या तपता भारतवर्ष लिखूं, मैं लिखना चाहूं विश्वपटल संग्राम को , या महंगाई की मार लिखूं , मैं लिखूं किसी किशोरी का चीर हरण या न्यायिक विलंब का वरण करूं, मैं सुस्त नेता पर व्यंग करूं , या नक्सलवाद का मर्म करूं , मैं जातिवाद की बात करूं या , आतंकवाद के खिलाफ लिखूं , मैं तुष्टिकरण का जिक्र करूं या , भाई भतीजावाद की फिक्र करूं, मैं लिखना चाहूं भ्रष्टाचार को पर मातृभक्त प्रताप की धरा पर कैसे लिखूं, मैं लिखना चाहू असामाजिक तत्व को पर पुरुषोत्तम की धरती पर कैसे लिखूं ,
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
