सिर्फ तुम समझती हो
वल्लभा!तुम चुप हो तो घर में सन्नाटा ठहर जाता है, मेरे होने का हर एहसास बिखर जाता है। मेरे लफ़्ज़ों में शायद कोई खरोंच रह गई, बात छोटी थी मगर दिल तक उतर गई। दुनिया कहे तो ये बस एक नाराज़गी होगी, पर मुझे पता है—ये चुप्पी कितनी गहरी होगी। मैंने जो कहा, वो मेरा इरादा नहीं था, पर जो तुमने सहा… वो तो वादा नहीं था। अब हर लफ़्ज़ से पहले तुम्हें याद करूँगा, तुम्हारी हँसी के लिए खुद से भी लड़ूँगा। याद है… जब तुम बाँहों में भरकर यूँ थाम लेती हो, मेरे हर टूटे हिस्से को चुपचाप जोड़ देती हो। बस एक बार फिर वही मुस्कान लौटा दो, जो किसी और को नहीं; बस मुझे समझ आती हो। मेरी गलती को मेरी मजबूरी न समझना, मैं सम्भल जाऊँगा… बस तुम दूर न समझना।।
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