"हक की गूँज: मिट्टी से बैंक त
हक माँगा था मैंने तुमसे, कोई भीख नहीं माँगी थी, अपनी ही बहन की पूँजी की, बस एक सीख माँगी थी। पर जब बंद मिले सब दरवाज़े, और पत्थर हुई तुम्हारी आँख, तब मिट्टी से ही वापस लाया, अपनी बहन की सूखी राख। तुम कहते हो मैं अपराधी हूँ, मैंने मर्यादा को तोड़ा है, पर देखो अपने सिस्टम को, जिसने मुझको कहीं न छोड़ा है। जहाँ जिंदा इंसान की चीखें भी, दीवारों से टकराती हैं, वहाँ लाशें भी अब चैन कहाँ, मिट्टी के नीचे पाती हैं? वो हड्डियाँ नहीं, वो साक्ष्य था, मेरी बेबसी का नंगा सच, तुम कागज़-कागज़ खेलते रहे, और बिछाते रहे नियमों का मंच। मजबूरी को मेरी झुठला दो, पर सच कैसे झुठलाओगे? जब रूह सवाल करेगी तुमसे, तो क्या फाइल दिखलाओगे? अपराधी हूँ मैं? हाँ शायद! कि मैंने कब्र को खोदा है, पर तुमने तो पूरी मानवता का, सरेआम किया सौदा है। पैसे तो तुमने दे दिए, पर जो घाव दिया वो गहरा है, आज इंसानियत के चेहरे पर, तुम्हारी चुप्पी का पहरा है।
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