पिता के पैरों के छाले..🥹
वो फटा पुराना जूता है, और भीतर दरकी राहें हैं, मंजिल तो मिली नहीं अब तक, पर थकी हुई ये बाहें हैं। भीषण गर्मी की लू में भी, वो तपती सड़क पर चलता है, तेरी एक सुनहरी सुबह के लिए, वो सूरज बनकर जलता है। जब छिल जाते हैं पाँव उसके, वो आह नहीं भर पाता है, रक्त रंजित छालों को वो, बस धूल से ही सहलाता है। कंधे पर बस्ता भारी है, और माथे पर है फिक्र बड़ी, तू पढ़-लिखकर कुछ बन जाए, बस यही आस है खड़ी-खड़ी। वो भूखा रहकर सोता है, ताकि तेरी भूख मिटा सके, अपनी फटी हुई बनियान छुपा, तुझे कोट-पैंट पहना सके। जब भर आती हैं आँखें उसकी, वो कोने में मुड़ जाता है, बाप का आँसू गिरे अगर, तो खुदा भी थर्रा जाता है। उन छालों से जो रिसता है, वो सिर्फ लहू का पानी नहीं, वो तेरी डिग्री की स्याही है, कोई आम कहानी नहीं। मत पूछ कि कितना रोता है, वो छुपकर काली रातों में, उसने पूरी उम्र गुजार दी, बस तेरी "हाँ" की बातों में। वो बूढ़ा कंधा झुक तो गया, पर तेरा मान न झुकने दिया, पैरों के छाले बढ़ते गए, पर उसने कदम न रुकने दिया। एक बार जरा तुम देख सको, उन फटे हुए तलवों को अगर, तो दुनिया की हर शोहरत तुमको, फीकी ही लगेगी उम्र भर।
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