०२/०३/२०२६ 💔
जब आदमी अपना प्रेम खोता है, तो वो केवल प्रेम नहीं खोता— वो खोता है अपना सर्वस्व, वो खोता है अपने जीने की एकमात्र आस, आदमी प्रेम खोने के बाद कभी नहीं जीता। वो रोज़ मरता है, वो मरता है जब उसके बारे में सोचता है, वो मरता है जब उसकी तस्वीर को निहारता है, और खुद को पूरी तरह मार देता है, जब उसकी सारी तस्वीरें जला देता है। वो केवल उस वक्त तस्वीर नहीं जलाता, वो अपने अंदर के बचे सारे प्रेम को राख कर देता है— ठीक उसी तरह जैसे पतंगा रोशनी के पास जाकर राख हो जाता है। सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता, फिर वो दिखाता है कि वो ठीक है, ऐसा जताता है कि कुछ हुआ ही नहीं, वैसे ही जीता है जैसे पहले जी रहा था। पर असल में, वो जीता ही नहीं— आदमी प्रेम खोने के बाद कभी नहीं जीता।।
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