अंतिम ख्वाहिश
✍️ ईश्वर ढकाल तुम जब मेरी जनाज़े में आओगी, तो थोड़ा जल्दी आना… क्योंकि जलाने वाले, मेरी तरह तुम्हारा इंतज़ार नहीं करेंगे। अगर कोई पूछे — “कौन था ये?” तो बस इतना कहना… एक पागल था, जो तुम्हें बेइंतहा प्यार करता था। जो तुम्हें पाने की जंग में, तुमसे ही लड़ता रहा… और आखिर में, खुद ही हार गया। जब मेरी लाश मेरे आँगन में पड़ी होगी, तब एक बार आकर देखना मेरी वो आँखें… जिनमें आख़िरी साँस तक, सिर्फ तुम ही रहेगी। आकर एक बार मुझे छू लेना, शायद मेरी रूह को सुकून मिल जाए… और मैं इस दर्द से आज़ाद हो जाऊँ। आओगी न… मेरे उस आख़िरी दिन? तुम आओ तो फूल मत लाना, मालाएँ भी मत लाना… बस एक बार मेरे कान में धीरे से कह देना— “तुम मेरे हो…” जो मैं जीते जी सुन न पाया, वो अल्फ़ाज़… मेरी अंतिम यात्रा के दिन मुझे दे जाना… शायद उसी पल, मेरी अधूरी मोहब्बत को मुक्ति मिल जाए…
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