जिदंगी की किताब
ये जिंदगी भी एक किताब सी है, जिसके कुछ ही पन्ने अब शेष बचे हैं। न जाने कब आखिरी सफहा (पन्ना) मुड़ जाए, और ये दास्ताँ मुकम्मल हो जाए। जब भी बंद होगी ये किताब एक दिन, इसमें सुनहरी यादों का बसेरा होगा। कुछ खट्टे-मीठे कस्से दर्ज होगें। उतार चढ़ावो का गहरा घेरा होगा। आखों में न वे आसूं रहेगे, न होगा आखों में अधेरा, जिदंगी मे फूल खिलेगे खुशियों के, होगा जिदंगी का नया सवेरा, जिदंगी की किताब के हर पन्ने, समेटे होगें कुछ नई यादें, जो यादें कभी हमने देखी और महसूस की थी, आज वे केवल यादें बन कर रह जाएगी, स्याही से पन्नों पर जो उकेरा है मैंने, वही इस किताब की असल सुंदरता है। कोई न पड़े इसे, शायद कोई फेंक भी दे, पर समय के पास सब का हिसाब है। मगर मुमकिन है, कोई मुसाफिर इसे पढ़े, इस किताब में पन्ने भले ही कम हो। शायद इसके अंदर शब्द भी कम हो, लेकिन इसके अंदर की भावनाएं इससे कई ज्यादा होगी। मिलती होगी इस किताब की यादें उस मुसाफिर की जिंदगी की यादों के साथ जो जिदंगी कभी खुशियों की होगी , तो कभी दुखों की, जो मुसाफिर इस किताब को पढेगा उसकी खुद की जिंदगी के पन्ने कुछ ही शेष होगें और पढ़ कर मुस्कुरा कर कहेगा न जाने ये सफर कब खत्म होगा। अब मैं आपसे पूछती हूँ कि ये जिंदगी की किताब कब खत्म होगी? Chandni Kumari
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