"गंगा: शिखर की बेटी"
गंगोत्री का उद्गम लिखूँ या देवप्रयाग का संगम लिखूँ, ऋषिकेश का ध्यान लिखूँ या हरिद्वार का स्नान लिखूँ। लिखूँ हिमालय अचल खड़ा, जो भारत का रखवाला है, शीश झुकाए खड़ा जहाँ पर, खुद अंबर मतवाला है। बर्फ़ ढकी उन चोटियों का, ऊँचा मैं सम्मान लिखूँ, या गोदी में खेल रही, गंगा का मैं दान लिखूँ। पर्वत-पर्वत राह बनाती, जब ये नीचे आती है, पत्थर से टकराती लहरें, मधुर गीत सुनाती है। नन्हीं सी इक बिटिया का, पर्वत पर मैं प्यार लिखूँ, या फिर उसकी कल-कल में, शीतल सी बौछार लिखूँ। अलकनंदा-भागीरथी का, पावन वो अनुबंध लिखूँ, दो प्राणों के मिलन सरीखा, गहरा वो संबंध लिखूँ। देवप्रयाग के उस संगम पर, थमता हर तूफ़ान लिखूँ, जीवन और मोक्ष का जहाँ, होता है उत्थान लिखूँ। ऋषिकेश के घाटों पर, गूँजा जो पावन मौन लिखूँ, मैया तेरी कृपा के आगे, जग में बोलो कौन लिखूँ। हरिद्वार की शाम सुहानी, दीपों की मैं हार लिखूँ, पाप मिटाती लहरों का, मैं पावन सा उपकार लिखूँ। लिखूँ कि कैसे मैदानों की, प्यासी मिट्टी चूमती है, हरियाली की ओढ़ चुनरिया, झूम-झूम कर घूमती है। थके हुए इन राही का, मैं शीतल सा विश्राम लिखूँ, या हर तड़पती आत्मा का, माँ गंगा तेरा नाम लिखूँ। लिखूँ कि कैसे काशी में यह, शिव का रूप दिखाती है, मुक्ति का संदेश सुनाकर, सोए भाग्य जगाती है। सागर की उस गहराई में, बहता पावन नाम लिखूँ, अमृत की इस बूँद-बूँद में, मैं अपना विश्राम लिखूँ।
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