फास्ट लोकल
ना जाने कब जिंदगी घड़ी के काटो से नापने लगी, कि हर शरण पर उसकी प्रतिक्रिया लिखकर पत्थर की लकीर सी जम गई है; ना सास लेने की फुरसत, ना ही सोचने का अधिकार, बस इस तेज़ रफ्तार वाले शहर में भीड़ के साथ रोज चले जा रहे; आए तो थे सपनों को हकीकत करने, पर उत्तरजीविता में पता ही ना चला कब सपनों का स्टीयरिंग व्हील ब्रेक मारकर भाग दौड़ के कश्मकश में कही खो गई।
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