कृष्ण
अगर तू मिले सिर्फ मंदिर में, तो भगवान कैसा, हर धड़कन में जो ना बस सके, वो अरमान कैसा। अगर दिखे तू मुझे सिर्फ दीवारों के बीच, तो फिर ये खुला आसमान और ये जहान कैसा। तेरी रोशनी अगर बस दीपों तक सीमित रहे, तो सूरज की पहली किरण का फिर मान कैसा। मैं ढूंढूं तुझे हर चेहरे में, हर एहसास में, अगर तू मिले ही नहीं मुझमें, तो पहचान कैसा। अगर तुझे पाने के लिए मुझे राहें ही बदलनी पड़ें, तो फिर ये दिल, ये मोहब्बत, आसान कैसा। हर राह के मोड़ पर तेरा ही तो निशान है, हर दिल की खामोशी में तेरा ही बयान है। भीड़ में भी तन्हा जो तुझे महसूस कर ले, वही तो समझे कि तू कितना मेहरबान है। तू हवा के झोंकों में, तू बारिश की बूँदों में, तू हँसी की हल्की सी, अनकही सी धुनों में। तू दर्द में छुपी दुआ, तू सुकून की पहचान, तू हर एक पल में बसा, तू हर एक इंसान। अगर तुझे पाने को बस रिवाज़ ही निभाने हों, तो फिर ये सच्ची लगन, ये अरमान कैसा। ना पत्थरों में कैद है, ना सीमाओं में बंधा, तू तो हर उस दिल में है, जहाँ प्यार है सधा । जो आँख बंद करके भी तुझे महसूस कर ले, उसी के लिए तू है, वही तेरा रास्ता है। अगर दिखे तू मुझे सिर्फ मंदिर में, तो मैं इंसान कैसा… जो देख न पाए तुझे हर जगह, वो इमान कैसा।
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