अलविदा
सज गई डोली, हो गया श्रृंगार, कदम उठके भरने लगे एक नई दुनिया के ओर, अलबेली और सुनहरी ही सही, पर चलते चलते यादों के एक समंदर ने ऐसा धारा में लपेटा कि कुछ शरण बाबुल की दीवारों में ही डूब के खो गई मै।
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