हृदय-रागिनी:
शशि की धवल चाँदनी जैसे, रूप तेरा अभिराम प्रिये, तेरे अधरों की लाली में, खिलता मेरा हर शाम प्रिये। मृदुल कपोलों पर गिरती जब, कुन्तल की काली छाया, लगता जैसे कंचन तन पर, सावन की घनघोर घटा छाया। किंकिणी-नूपुर का वह स्वर, मन में राग जगाता है, जैसे निर्झर झरनों का संगीत, हृदय को भाता है। नयनों के चपल कटाक्षों से, तुम बाण विरह के छोड़ो मत, इस सजल प्रेम के बंधन को, तुम निष्ठुर होकर तोड़ो मत। तव अधर-सुधा के रस-पान को, मेरा मन चातक सा प्यासा, तुम ही मेरी जीवन-संगिनी, तुम ही अंतिम अभिलाषा। कुंकुम के उन पद-चिह्नों पर, मैं अपना शीश झुकाता हूँ, श्रृंगार तेरा सम्पूर्ण हो, मैं यही गीत अब गाता हूँ। तुम मलय पवन की शीतलता, मैं तपता हुआ निदाघ प्रिये, तेरे पावन शुचि अंतर में, मेरा ही एक अनुराग प्रिये। जब कंचन सी काया तेरी, चंदन की गंध बिखेरती है, सृष्टि की सारी सुंदरता, तेरी छाया में ठहरती है। तव नयन-कमल की चंचलता, जैसे सरिता की लहरें हों, जिनमें डूबी मेरी यादें, सागर से भी गहरी हों। जब मंद-मंद मुसकाती हो, जैसे कलियाँ चटकती हैं, तेरे कंगन की खन-खन से, दिशाएँ सारी महकती हैं। तेरी ग्रीवा की वह भंगिमा, जैसे मयूर का नाच प्रिये, जिसके आगे सब फीका है, जो प्रेम का सच्चा साँच प्रिये। तू मयंक के शीतल प्रकाश सी, मैं कुमुद सा खिल जाता हूँ, तेरी बाँहों के घेरे में, मैं सर्वस्व अपना पाता हूँ।
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